Tuesday, 2 June 2015

ओ आँखें

ओ आँखें 

उन आँखों में गजब सी प्यास थी 
उन आँखों में गजब सी तलास थी 
उन आँखों में प्यार तो था .......  
उन आँखों में दुत्कार भी था !!!
 उन आँखों में अनंत सवाल थे 
उन आँखों में कई गीले गीले ख्याल थे 

तीन साल की " ओ आँखें" 
भीड़ तो चीरते हुए स्कूल के रिक्से से जा  थीं 
सैकड़ो आँखों के बीच भी अपने को अकेला पा रहीं थीं 

"ओ आँखें " न जाने क्या खोज रहीं थीं 
सायद कभी  अपने में दुनिया को और कभी दुनिया में अपने को ढूंढ रही थीं 
उन आँखों में मैंने अर्चना देखी 
उन आँखों में मैंने  गर्जना  देखी
ओ आँखें कभी सूर्य के किरणों को समेटना चाहती थीं 
 तो कभी दुनिया के कुतूहल को  आगोश में लपेटना चाहती थीं 

ओ आँखें कंही यहां कभी वहां 
कभी कार के नाचते पहिये पर 
तो कभी बिन सहारे चलते दोपहिये पर 
देखतीं खुस होतीं और मुस्कुरा  देतीं 
अचानक उन्हें माँ की याद आती 
फिर चारो ओर ख़ामोशी सी  छा जाती 
पलकें उन्हें भिंगो देतीं 
उसमे आँसुओ की माला देतीं 
घूमता झूला उन आँसुओ को सोखना चाहता 
उन्हें अब और मोती टपकाने से रोकना चाहता 

कितनी  प्यारी थीं ओ आँखें 
दुनिया के सारे रंग अपने में समेटतीं 
अपने सारे रंग दुनिया में बिखेरतीं 

"ओ आँखें"


  

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